क्या वाकई परिसीमन से घट जाएगा साउथ का 'पॉलिटिकल प्रतिशत'? क्या हिंदी भाषी राज्यों को होगा फायदा मोदी सरकार ने लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल और परिसीमन के लिए विधेयक पेश किया है। लोकसभा में अभी 543 सीटें हैं, लेकिन परिसीमन के बाद इनकी संख्या 850 हो जाएगी। इस परिसीमन से साउथ के राज्यों का राजनीतिक प्रतिशत केंद्र में घटेगा और हिंदी भाषी राज्यों का प्रतिशत बढ़ेगा। इस बिल के प्रभावों को लेकर बहस छिड़ गई है। परिसीमन के बारे में दक्षिण के राज्यों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। इसके कारण विपक्ष इस बिल के खिलाफ है। इस विधेयक के अनुसार लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर अधिकतम 850 कर दी गई है। इसमें राज्यों में 815 सीटें और केंद्र शासित प्रदेशों में 35 सीटें होंगी। इनमें से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। मसौदे में राज्यवार सीटों के आवंटन के बारे में कोई विशिष्ट जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए सभी राज्यों में 50 फीसदी की सीटों की बढ़ोत्तरी होगी। लेकिन 2011 की जनगणना के आधार पर संसदीय सीट पुनर्गठन होता है तो उत्तर के राज्यों की सीटें बढ़ जाएंगी। इस कारण उन राज्यों में चिंता पैदा हो गई है जिनकी जनसंख्या पिछले दशकों में स्थिर रही है। इसलिए साउथ के राज्यों में चिंता बढ़ गई है। परिसीमन विधेयक, 2026 में परिसीमन आयोग के गठन का प्रावधान है। आयोग का कर्तव्य होगा कि वह 'नवीनतम जनगणना आंकड़ों' के आधार पर सीटों के आवंटन को पुनः समायोजित करे। मौजूदा समय में 22,29,936 लोगों पर एक लोकसभा सीट तय की गई है, लेकिन अब 14,24,535 लोगों पर एक सीट बनाने की रणनीति है। दक्षिण बनाम उत्तर भारत के राज्यों की सियासी बहस छिड़ गई है। इस बिल के अनुसार जनसंख्या के आधार पर सीटों का परिसीमन होता है तो साउथ के राज्यों का प्रतिनिधित्व केंद्र में घटेगा। इस कारण दक्षिण भारत के राज्य परिसीमन का विरोध कर रहे हैं। हिंदी भाषी राज्यों का प्रतिनिधित्व संसद में बढ़ जाएगा। उत्तर प्रदेश में 25 सीटें हैं, जो बढ़कर 48 हो जाएंगी। इस तरह राजस्थान का 4.6 फीसदी से प्रतिनिधित्व बढ़कर 5.#lok_sabha #north_india #south_india #modi_sar #parisimana_bill
